चल उठ चल, तू क्यो रूक सा गया ।
इस जीवन की दौड में, तू क्यों थम सा गया ।
तू अजर अमर सचेत है, फिर इन मिटते जंजालों
में
जाने क्यों उलझ गया ।
तोड दे इन जंजालों को, खुद को जीवन की धार में
बह जाने दे ।
चल उठ चल, तू क्यों रूक सा गया ।
इस जीवन की दौड में, तू क्यों थम सा गया ।
मत सुन इस मन की, जो चंचलता के तीर बरसाता है
।
इस जीवन में तीर रूपी विचारों से घेरकर
हमको सताता है ।
रोक देता है हमको धारा में
बाँध बनकर खडा हो जाता है ।
तू मत भूल, तू ही धारा है
सुनामियों के बबंडर बनकर
इन बाँधों को खंडहर कर सकता है ।
चल उठ चल, तू क्यों रूक सा गया ।
इस जीवन की दौड में, तू क्यों थम सा गया ।
रचयिता – Ravi Titoriya

2 Comments
So nice poem
ReplyDelete👍
ReplyDelete