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मैं मन नही हूँ ।

 

चल उठ चल, तू क्यो रूक सा गया ।

इस जीवन की दौड में, तू क्यों थम सा गया ।

 

तू अजर अमर सचेत है, फिर इन मिटते जंजालों में

जाने क्यों उलझ गया ।

तोड दे इन जंजालों को, खुद को जीवन की धार में

बह जाने दे ।

 

चल उठ चल, तू क्यों रूक सा गया ।

इस जीवन की दौड में, तू क्यों थम सा गया ।

 

मत सुन इस मन की, जो चंचलता के तीर बरसाता है ।

इस जीवन में तीर रूपी विचारों से घेरकर

हमको सताता है ।

रोक देता है हमको धारा में

बाँध बनकर खडा हो जाता है ।

तू मत भूल, तू ही धारा है

सुनामियों के बबंडर बनकर

इन बाँधों को खंडहर कर सकता है ।

 

चल उठ चल, तू क्यों रूक सा गया ।

इस जीवन की दौड में, तू क्यों थम सा गया



रचयिता – Ravi Titoriya

    

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