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एक नई जिंदगी मिल गई।

खुशनसीब हूं मैं, नई जिंदगी मिल गई
इस बसंत पतझड़ के बाद एक कली भी खिल गई।

लगता था मानो दुनिया सारी, मन मेरे उजड़ गई 
थी हर आशा सिमटी सी, जीवन की धारा रुक गई
फिर ईश की क्रिया देख, आत्म की सुन पुकार 
एक नदी की बाढ़ में, सुंदर सी नौका मिल गई। 

खुशनसीब हूं मैं, नई जिंदगी मिल गई
इस बसंत पतझड़ के बाद, एक कली भी खिल गई। 

ना हो निराश तुम,ना निराशा धर्म है
निराशा जन्मी दैत्य से, पाप ही का कर्म है
छोड़ चिता सम चिंता तू, ये तेरी शर्म है 
आनंद जीवन तू जिए, यही तो आत्म धर्म है।

 न डर बिखरे शूलों से, यह तेरा निखार हैं
 निखरता हूं हर वक्त, जैसे यह आदत बन गई ।
 खुशनसीब हूं मैं, नई जिंदगी मिल गई
  इस बसंत पतझड़ के बाद, एक कली भी खिल गई।



लेखक-रविदास टिटोरिया

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