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नौकरी की तैयारी

पढ़ रहा हूं मैं किताबें 
रात दिन चिंता खाए रही,
 यह जालिम जमाना और 
महंगाई हम सबको रुलाए रही ।

बेरोजगारी का बोझ सारा 
अपने सर लिए घूम रहे,
और यह सरकारें फ्री के वोट खाए रही ।
विल पावर जगा जगा कर 
खुद भी शर्म आए रही,
रिवीजन की मार दिमाग पर 
अच्छी निंदिया लाए रही ।

 ग्रेजुएशन कंप्लीट हुआ 19 में 
और 2 साल से लोकडाउन में, 
घर पर प्याज उगाए रहे ।
अब फिर से जग रहे हैं तैयारी के लिए
 तब तक आधा ज्ञान भलाए रहे ।

 देखते हैं करते हैं फिर से प्रयास 
एक चांस मानकर भविष्य की योजना बनाए रहे ।

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